सर्पदंश मुआवजा घोटाला: पुलिसकर्मियों की मिलीभगत आई सामने, 19 आरोपी कार्रवाई के दायरे में
बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में सामने आए करोड़ों रुपये के चर्चित और फर्जी सर्पदंश (सांप काटने से मौत) मुआवजा घोटाले में पुलिस की कार्रवाई लगातार तेज बनी हुई है। इस सनसनीखेज मामले में पुलिस ने जांच का दायरा बढ़ाते हुए दो और पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार कर लिया है। इसके साथ ही इस बड़े वित्तीय फर्जीवाड़े में अब तक गिरफ्तार किए गए कुल आरोपियों की संख्या बढ़कर 19 हो गई है। बिलासपुर के अलग-अलग थानों में इस धोखाधड़ी से जुड़े कई मामले दर्ज हैं और पुलिस तथा विशेष जांच दल द्वारा इस पूरे सिंडिकेट की गहराई से छानबीन की जा रही है।
फरार डॉक्टर एस.एन. बोले की तलाश जारी, कई अन्य अधिकारी भी रडार पर
इस बीच, इस पूरे रैकेट की कड़ियां जोड़ने में जुटे सिम्स (SIMS) के फरार डॉक्टर एस.एन. बोले की गिरफ्तारी के लिए पुलिस द्वारा सरगर्मी से तलाश की जा रही है। जांच के दायरे में केवल पुलिसकर्मी ही नहीं आ रहे हैं, बल्कि एक पूर्व तहसीलदार समेत कई अन्य जिम्मेदार प्रशासनिक अधिकारी भी संदेह के घेरे में हैं। पुलिस हरसंभव पहलू और साक्ष्य की बारीकी से जांच कर रही है, और यह उम्मीद जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और भी बड़े और चौंकाने वाले खुलासे सामने आ सकते हैं।
विधानसभा में मुद्दा गूंजने के बाद प्रशासन और पुलिस ने तेज की जांच
यह पूरा बहुचर्चित मामला जब छत्तीसगढ़ विधानसभा के पटल पर उठाया गया, तो उसके बाद जिला प्रशासन और पुलिस महकमे में हड़कंप मच गया और ताबड़तोड़ कार्रवाई शुरू कर दी गई। प्रशासन की ओर से नायब नाजिर की आधिकारिक शिकायत पर बिलासपुर के सिविल लाइन, सरकंडा, कोनी, कोतवाली, तोरवा और सिरगिट्टी थाना क्षेत्रों में फर्जी तरीके से सर्पदंश से मौत दिखाकर मुआवजा हड़पने के कुल 15 मामलों में गंभीर धाराओं के तहत एफआईआर दर्ज की गई। इसके बाद वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) रजनेश सिंह के सख्त निर्देशों पर अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक (ASP) पंकज पटेल के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित कर इन सभी मामलों से जुड़ी पुरानी फाइलों और दस्तावेजों की दोबारा से गहन समीक्षा शुरू की गई।
कैसा होता था यह पूरा फर्जीवाड़ा? जानिए रैकेट का काला सच
पुलिस की अब तक की जांच में यह बात खुलकर सामने आई है कि इस पूरे ठगी रैकेट का कथित मास्टरमाइंड एक वकील था, जिसका नाम हीराप्रसाद खांडेकर बताया जा रहा है। उसने अपने इस अवैध नेटवर्क में कुछ बैंक कर्मियों, तहसील कार्यालय से जुड़े लोगों और अन्य बिचौलियों को शामिल कर रखा था।
इस गिरोह का काम करने का तरीका बेहद शातिर था:
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जब भी इलाके में किसी व्यक्ति की प्राकृतिक या सामान्य कारणों से मौत होती थी, तो यह गिरोह सक्रिय हो जाता था।
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गिरोह के सदस्य मृतक के दुखी परिजनों से संपर्क साधते थे और उन्हें सरकारी सर्पदंश सहायता राशि (मुआवजा) आसानी से दिलवाने का लालच और प्रस्ताव देते थे।
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इसके बाद पूरी साजिश के तहत कथित रूप से फर्जी शपथपत्र (एफिडेविट), जाली पोस्टमार्टम रिपोर्ट और अन्य कूटरचित दस्तावेज तैयार करवाए जाते थे।
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इन फर्जी दस्तावेजों को तहसील कार्यालय में जमा कराकर मुआवजे की फाइल पास कराई जाती थी।
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सरकारी मुआवजा राशि सीधे हाथ लगने के लिए गिरोह द्वारा पीड़ितों के नाम पर नए बैंक खाते खुलवाने की व्यवस्था भी खुद ही कराई जाती थी, ताकि पैसे आते ही उन्हें आसानी से निकाला जा सके।

