उत्तर प्रदेश में नई श्रम व्यवस्था: श्रमिकों के वेतन, पीएफ और कार्य संस्कृति में बड़े बदलाव की तैयारी

लखनऊ| उत्तर प्रदेश सरकार ने राज्य में औद्योगिक विकास को गति देने और श्रमिकों के हितों को सुरक्षित करने के लिए चार नई श्रम संहिताओं (Labor Codes) के क्रियान्वयन की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य दशकों पुराने और जटिल श्रम कानूनों को सरल बनाकर एक पारदर्शी व्यवस्था स्थापित करना है।

राज्य स्तर पर नियमों का मसौदा (Draft) अधिसूचित कर दिया गया है और वर्तमान में यह सार्वजनिक डोमेन में है ताकि हितधारकों से सुझाव और आपत्तियां ली जा सकें। प्राप्त फीडबैक के आधार पर अंतिम नियमों को मई में अधिसूचित किए जाने की प्रबल संभावना है।

29 कानूनों का विलय: चार प्रमुख संहिताएँ

नई व्यवस्था के तहत 29 पुराने और असंगत श्रम कानूनों को समाप्त कर उन्हें चार प्रमुख श्रेणियों में समाहित किया गया है:

  1. वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages)

  2. औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (Industrial Relations Code)

  3. व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशाएं संहिता, 2020 (OSH Code)

  4. सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (Social Security Code)


वेतन संरचना और टेक-होम सैलरी पर प्रभाव

नए नियमों में 'वेतन' की परिभाषा को पूरी तरह बदल दिया गया है। अब कर्मचारी के कुल वेतन (CTC) का कम से कम 50 फीसदी हिस्सा मूल वेतन (Basic Salary) होना अनिवार्य होगा।

  • लाभ: इससे कर्मचारी के पीएफ (PF), ग्रेच्युटी और रिटायरमेंट के समय मिलने वाले बोनस में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

  • न्यूनतम वेतन: पहली बार सभी क्षेत्रों (संगठित और असंगठित) के कर्मचारियों के लिए न्यूनतम वेतन अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार एक 'फ्लोर वेज' तय करेगी, जिससे नीचे कोई भी राज्य वेतन निर्धारित नहीं कर सकेगा।

कार्य के घंटे और अवकाश के नियम

नई संहिताओं में कार्यस्थल पर अनुशासन और उत्पादकता बढ़ाने के लिए स्पष्ट प्रावधान किए गए हैं:

  • साप्ताहिक सीमा: एक सप्ताह में कार्य की अधिकतम सीमा 48 घंटे तय की गई है। दैनिक कार्य दिवस 8 घंटे का होगा।

  • ओवरटाइम: निर्धारित घंटों से अधिक कार्य करने पर नियोक्ता को कर्मचारी को सामान्य वेतन से दोगुना भुगतान करना होगा।

  • समय पर भुगतान: सभी नियोक्ताओं के लिए हर महीने की 7 तारीख तक वेतन का भुगतान करना कानूनी रूप से अनिवार्य होगा।


सामाजिक सुरक्षा का दायरा और 'गिग वर्कर'

पहली बार कानून के दायरे में उन श्रमिकों को भी लाया गया है जो पारंपरिक कार्यालयों से बाहर काम करते हैं।

  • गिग और प्लेटफॉर्म वर्कर्स: जोमैटो, स्विगी और ओला जैसे ऐप-आधारित कामगारों को सामाजिक सुरक्षा फंड का लाभ मिलेगा। कंपनियों को अपने वार्षिक टर्नओवर का 1-2% इस फंड में योगदान देना होगा।

  • हादसे की परिभाषा: यदि कार्यस्थल पर आने या जाने के दौरान कोई दुर्घटना होती है, तो उसे 'कार्य से जुड़ी दुर्घटना' माना जाएगा और कर्मचारी मुआवजे का हकदार होगा।

  • स्वास्थ्य परीक्षण: 40 वर्ष से अधिक आयु के सभी श्रमिकों का वार्षिक स्वास्थ्य परीक्षण कराना कंपनी की जिम्मेदारी होगी।


नियोक्ताओं और एमएसएमई (MSME) के लिए बदलाव

नई संहिताओं का उद्देश्य 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' को बढ़ावा देना भी है:

  • छंटनी के नियम: अब 300 या उससे अधिक श्रमिकों वाले संस्थानों को ही छंटनी या इकाई बंद करने के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेनी होगी (पहले यह सीमा 100 थी)।

  • री-स्किलिंग फंड: छंटनी की स्थिति में नियोक्ता को कर्मचारी के 15 दिन के वेतन के बराबर राशि 'री-स्किलिंग फंड' में जमा करनी होगी, ताकि श्रमिक नया कौशल सीख सके।

  • हड़ताल पर अंकुश: औद्योगिक शांति बनाए रखने के लिए अब किसी भी हड़ताल से पहले 14 दिन का नोटिस देना अनिवार्य होगा।

महिला सशक्तिकरण और सुरक्षा

नए कानून महिलाओं को कार्यस्थल पर समान अवसर प्रदान करते हैं। अब महिलाओं को उनकी सहमति से सभी शिफ्टों (नाइट शिफ्ट सहित) में काम करने की अनुमति होगी, बशर्ते नियोक्ता उनकी सुरक्षा और परिवहन के पुख्ता इंतजाम करे। साथ ही, समान कार्य के लिए लिंग, जाति या धर्म के आधार पर वेतन में भेदभाव को पूरी तरह समाप्त कर दिया गया है।

अनुपालन और जुर्माना

निरीक्षण की पुरानी 'इंस्पेक्टर राज' व्यवस्था को खत्म कर अब 'इंस्पेक्टर-कम-फैसिलिटेटर' प्रणाली लागू की जाएगी।

  • छोटे तकनीकी उल्लंघनों पर कंपनियों को पहले सुधार का मौका दिया जाएगा।

  • गंभीर और जानबूझकर किए गए उल्लंघनों के लिए जुर्माने की राशि को बढ़ाकर 20 लाख रुपये तक कर दिया गया है।